(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.39. अध्यायः 039
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
एलापत्रोपदेशेन वासुकिभगिन्या जरत्कार्वा रक्षणम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

सौतिरुवाच। 1-39-0x(182)(1767)
एलापत्रवचः श्रुत्वा ते नागा द्विजसत्तम।
सर्वे प्रहृष्टमनसः साधुसाध्वित्यपूजयन्॥ 1-39-1(1768)
ततःप्रभृति तां कन्यां वासुकिः पर्यरक्षत।
जरत्कारुं स्वसारं वै परं हर्षमवाप च॥ 1-39-2(1769)
ततो नातिमहान्कालः समतीत इवाभवत्।
अथ देवासुराः `सर्वे ममन्थुर्वरुणालयम्॥ 1-39-3(1770)
तत्र नेत्रमभून्नागो वासुकिर्बलिनां वरः।
समाप्यैव च तत्कर्म पितामहमुपागमन्॥ 1-39-4(1771)
देवा वासुकिना सार्धं पितामहमथाव्रुवन्।
भगवञ्शापभीतोऽयं वासुकिस्तप्यते भृशम्॥ 1-39-5(1772)
अस्यैतन्मानसं शल्यं समुद्धर्तुं त्वमर्हसि।
जनन्याः शापजं देव ज्ञातीनां हितमिच्छतः॥ 1-39-6(1773)
हितो ह्ययं सदास्मकं प्रियकारी च नागराट्।
प्रसादं कुरु देवेश शमयास्य मनोज्वरम्॥ 1-39-7(1774)
ब्रह्मोवाच। 1-39-8x(183)
मयैव तद्वितीर्णं वै वचनं मनसाऽमराः।
एलापत्रेण नागेन यदस्याभिहितं पुरा॥ 1-39-8(1775)
तत्करोत्वेष नागेन्द्रः प्राप्तकालं वचः स्वयम्।
विनशिष्यन्ति ये पापा न तु ये धर्मचारिणः॥ 1-39-9(1776)
उत्पन्नः स जरत्कारुस्तपस्युग्रे रतो द्विजः।
तस्यैष भगिनीं काले जरत्कारुं प्रयच्छतु॥ 1-39-10(1777)
एलापत्रेण यत्प्रोक्तं वचनं भुजगेन ह।
पन्नगानां हितं देवास्तत्तथा न तदन्यथा॥ 1-39-11(1778)
सौतिरुवाच। 1-39-12x(184)
एतच्छ्रुत्वा तु नागेन्द्रः पितामहवचस्तदा।
संदिश्य पन्नगान्सर्वान्वासुकिः शापमोहितः॥ 1-39-12(1779)
स्वसारमुद्यम्य तदा जरत्कारुमृषिं प्रति।
सर्पान्बहूञ्जरत्कारौ नित्ययुक्तान्समादधत्॥ 1-39-13(1780)
जरत्कारुर्यदा भार्यामिच्छेद्वरयितुं प्रभुः।
शीघ्रमेत्य तदाऽऽख्येयं तन्नः श्रेयो भविष्यति॥ ॥ 1-39-14(1781)

इति श्रीमनमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ 39 ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-39-4 नेत्रं रज्जुः॥ 1-39-13 जरत्कारौ जरत्कारुऋषिनिमित्तं। तदन्वेषणायेत्यर्थः॥ एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ 39 ॥


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